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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 8-9h
 
 
श्लोक  1.63.8-9h 
तपसो हि महाविघ्नो विश्वामित्रमुपागमत्।
तस्यां वसन्त्यां वर्षाणि पञ्च पञ्च च राघव॥ ८॥
विश्वामित्राश्रमे सौम्ये सुखेन व्यतिचक्रमु:।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विश्वामित्र की तपस्या में एक बड़ी बाधा उपस्थित हो गई। रघुनन्दन! मेनका ने विश्वामित्र के उस सौम्य आश्रम में बड़े सुख से दस वर्ष व्यतीत किए।
 
In this way a big obstacle in the penance of Vishwamitra presented itself to him. Raghunandan! Menaka spent ten years very happily living in that gentle hermitage of Vishwamitra. 8 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)