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ramayan 1.59.20-22h: वे लोग विकृत और विरूप होकर इन लोकों में विचरते रहे। साथ ही मुझ निर्दोष को भी भ्रष्ट करने वाला वह मूर्ख श्रीमान् निःशदयोन्मुख होकर, समस्त लोगों द्वारा निन्दित, अन्य प्राणियों की हिंसा करने में तत्पर और दयारहित होकर मेरे क्रोध के कारण दीर्घकाल तक दुःख भोगेगा। 20-21 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.59: विश्वामित्र का त्रिशंकु का यज्ञ कराने के लिये ऋषिमुनियों को आमन्त्रित करना और उनकी बात न मानने वाले महोदय तथा ऋषिपुत्रों को शाप देकर नष्ट करना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 59: विश्वामित्र का त्रिशंकु का यज्ञ कराने के लिये ऋषिमुनियों को आमन्त्रित करना और उनकी बात न मानने वाले महोदय तथा ऋषिपुत्रों को शाप देकर नष्ट करना  »  श्लोक 20-22h
 
 
श्लोक  1.59.20-22h 
विकृताश्च विरूपाश्च लोकाननुचरन्त्विमान्।
महोदयश्च दुर्बुद्धिर्मामदूष्यं ह्यदूषयत्॥ २०॥
दूषित: सर्वलोकेषु निषादत्वं गमिष्यति।
प्राणातिपातनिरतो निरनुक्रोशतां गत:॥ २१॥
दीर्घकालं मम क्रोधाद् दुर्गतिं वर्तयिष्यति।
 
 
अनुवाद
वे लोग विकृत और विरूप होकर इन लोकों में विचरते रहे। साथ ही मुझ निर्दोष को भी भ्रष्ट करने वाला वह मूर्ख श्रीमान् निःशदयोन्मुख होकर, समस्त लोगों द्वारा निन्दित, अन्य प्राणियों की हिंसा करने में तत्पर और दयारहित होकर मेरे क्रोध के कारण दीर्घकाल तक दुःख भोगेगा। 20-21 1/2॥
 
'Those people wandered in these worlds distorted and disfigured. At the same time, the foolish sir, who has corrupted even the blameless me, will suffer for a long time due to my anger by getting Nishadayo, reviled by all the people, ready to commit violence against other living beings and devoid of mercy.' 20-21 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)