श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 59: विश्वामित्र का त्रिशंकु का यज्ञ कराने के लिये ऋषिमुनियों को आमन्त्रित करना और उनकी बात न मानने वाले महोदय तथा ऋषिपुत्रों को शाप देकर नष्ट करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.59.2 
इक्ष्वाको स्वागतं वत्स जानामि त्वां सुधार्मिकम्।
शरणं ते प्रदास्यामि मा भैषीर्नृपपुंगव॥ २॥
 
 
अनुवाद
'पुत्र! इक्ष्वाकुवंशी! तुम्हारा स्वागत है। मैं जानता हूँ, तुम बड़े धर्मात्मा हो। राजन! डरो मत, मैं तुम्हें शरण दूँगा।॥ 2॥
 
'Son! Son of Ikshvaku clan! You are welcome. I know, you are a very pious person. King! Do not be afraid, I will give you shelter.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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