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ramayan 1.58.5-6h: 'पुरुषश्रेष्ठ! आप अभी भी भोले हैं, अपने नगर को लौट जाइए। पृथ्वीनाथ! भगवान वसिष्ठ तीनों लोकों में यज्ञ करने में समर्थ हैं, हम उनका अपमान कैसे कर सकते हैं?'॥5 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  1.58.5-6h 
बालिशस्त्वं नरश्रेष्ठ गम्यतां स्वपुरं पुन:।
याजने भगवान् शक्तस्त्रैलोक्यस्यापि पार्थिव॥ ५॥
अवमानं कथं कर्तुं तस्य शक्ष्यामहे वयम्।
 
 
अनुवाद
'पुरुषश्रेष्ठ! आप अभी भी भोले हैं, अपने नगर को लौट जाइए। पृथ्वीनाथ! भगवान वसिष्ठ तीनों लोकों में यज्ञ करने में समर्थ हैं, हम उनका अपमान कैसे कर सकते हैं?'॥5 1/2॥
 
‘Best of men! You are still naive, go back to your city. Prithvinath! Lord Vasishtha is capable of conducting yagnas in all the three worlds, how can we insult him?'॥ 5 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)