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ramayan 1.58.4: 'हम वह यज्ञ कैसे कर सकते हैं जिसे वसिष्ठ ऋषि ने असंभव घोषित किया है?'   |   ramayan सर्ग 1.58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  1.58.4 
अशक्यमिति सोवाच वसिष्ठो भगवानृषि:।
तं वयं वै समाहर्तुं क्रतुं शक्ता: कथंचन॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'हम वह यज्ञ कैसे कर सकते हैं जिसे वसिष्ठ ऋषि ने असंभव घोषित किया है?'
 
'How can we perform that yajna which the sage Vasistha has declared impossible?'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)