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ramayan 1.58.19-20h: सौम्य! मैं क्षत्रिय धर्म की शपथ लेकर तुमसे कहता हूँ कि मैंने पहले कभी झूठ नहीं बोला और आगे भी कभी ऐसा नहीं करूँगा, चाहे मुझे कितनी ही बड़ी कठिनाई क्यों न आ जाए॥19 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना  »  श्लोक 19-20h
 
 
श्लोक  1.58.19-20h 
अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन॥ १९॥
कृच्छ्रेष्वपि गत: सौम्य क्षत्रधर्मेण ते शपे।
 
 
अनुवाद
सौम्य! मैं क्षत्रिय धर्म की शपथ लेकर तुमसे कहता हूँ कि मैंने पहले कभी झूठ नहीं बोला और आगे भी कभी ऐसा नहीं करूँगा, चाहे मुझे कितनी ही बड़ी कठिनाई क्यों न आ जाए॥19 1/2॥
 
'Soumya! I swear on the Kshatriya Dharma and tell you that I have never spoken a lie in the past and I will never do so in the future even when faced with the greatest difficulty.॥ 19 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)