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ramayan 1.58.18-19h: सौम्यदर्शन मुनीश्वर! मैं इसी शरीर से स्वर्ग जाना चाहता था, किन्तु मेरी यह इच्छा पूरी न हो सकी। मैंने सैकड़ों यज्ञ किये हैं, किन्तु मुझे उनका कोई फल नहीं मिल रहा है।   |   ramayan सर्ग 1.58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  1.58.18-19h 
सशरीरो दिवं यायामिति मे सौम्यदर्शन॥ १८॥
मया चेष्टं क्रतुशतं तच्च नावाप्यते फलम्।
 
 
अनुवाद
सौम्यदर्शन मुनीश्वर! मैं इसी शरीर से स्वर्ग जाना चाहता था, किन्तु मेरी यह इच्छा पूरी न हो सकी। मैंने सैकड़ों यज्ञ किये हैं, किन्तु मुझे उनका कोई फल नहीं मिल रहा है।
 
'Saumyadarshan Munishwar! I wanted to go to heaven in this very body, but this wish could not be fulfilled. I have performed hundreds of yagyas; but I am not getting any result from them. 18 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)