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ramayan 1.58.17-18h: 'महर्षि! मुझे मेरे गुरु तथा उनके गुरुपुत्रों ने तिरस्कृत कर दिया। मुझे जो अभीष्ट वस्तु चाहिए थी, वह न मिलने से मैं अपनी इच्छा के विरुद्ध विपत्ति का भागी हुआ। 17 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  1.58.17-18h 
प्रत्याख्यातोऽस्मि गुरुणा गुरुपुत्रैस्तथैव च॥ १७॥
अनवाप्यैव तं कामं मया प्राप्तो विपर्यय:।
 
 
अनुवाद
'महर्षि! मुझे मेरे गुरु तथा उनके गुरुपुत्रों ने तिरस्कृत कर दिया। मुझे जो अभीष्ट वस्तु चाहिए थी, वह न मिलने से मैं अपनी इच्छा के विरुद्ध विपत्ति का भागी हुआ। 17 1/2॥
 
'Maharshe! I was rejected by my guru and his guru's sons. By not getting the desired thing that I wanted, I became a victim of disaster against my wish. 17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)