Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 1.58.1-2: रघुनन्दन! राजा त्रिशंकु के ये वचन सुनकर वसिष्ठ ऋषि के सौ पुत्र क्रोधित होकर उनसे इस प्रकार बोले - 'अरे मूर्ख! जब तुम्हारे सत्यनिष्ठ गुरु ने तुम्हें मना किया है, तब तुमने उनकी अवज्ञा करके दूसरी शाखा का आश्रय कैसे लिया?॥ 1-2॥ | ramayan सर्ग 1.58: वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना । ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ततस्त्रिशङ्कोर्वचनं श्रुत्वा क्रोधसमन्वितम्।
ऋषिपुत्रशतं राम राजानमिदमब्रवीत्॥ १॥
प्रत्याख्यातोऽसि दुर्मेधो गुरुणा सत्यवादिना।
तं कथं समतिक्रम्य शाखान्तरमुपेयिवान्॥ २॥
अनुवाद
रघुनन्दन! राजा त्रिशंकु के ये वचन सुनकर वसिष्ठ ऋषि के सौ पुत्र क्रोधित होकर उनसे इस प्रकार बोले - 'अरे मूर्ख! जब तुम्हारे सत्यनिष्ठ गुरु ने तुम्हें मना किया है, तब तुमने उनकी अवज्ञा करके दूसरी शाखा का आश्रय कैसे लिया?॥ 1-2॥
Raghunandan! On hearing these words of King Trisanku, the hundred sons of sage Vasishtha became angry and spoke to him thus - 'You fool! When your truthful Guru has forbidden you, then how did you disobey him and take shelter of another branch?॥ 1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥