श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 7-9h
 
 
श्लोक  1.57.7-9h 
विश्वामित्रोऽपि तच्छ्रुत्वा ह्रिया किंचिदवाङ्मुख:॥ ७॥
दु:खेन महताविष्ट: समन्युरिदमब्रवीत्।
तपश्च सुमहत् तप्तं राजर्षिरिति मां विदु:॥ ८॥
देवा: सर्षिगणा: सर्वे नास्ति मन्ये तप: फलम्।
 
 
अनुवाद
उनकी बातें सुनकर विश्वामित्र का मुख लज्जा से झुक गया। वे अत्यन्त दुःखी हुए और विनीत भाव से बोले, 'हाय! मैंने इतनी घोर तपस्या की है, फिर भी ऋषियों सहित सभी देवता मुझे राजर्षि ही मानते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी यह तपस्या फलीभूत नहीं हुई।'
 
On hearing his words, Vishwamitra's face bowed down in shame. He was very sad and humbly said to himself, 'Oh! Even though I have done such a great penance, all the gods including the sages consider me a royal sage. It seems that this penance has not borne any fruit.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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