vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 1: बाल काण्ड
»
सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना
»
श्लोक 22
श्लोक
1.57.22
इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधा: परमा गति:।
तस्मादनन्तरं सर्वे भवन्तो दैवतं मम॥ २२॥
अनुवाद
'समस्त इक्ष्वाकु वंश के लिए पुरोहित वसिष्ठजी ही परम मोक्ष हैं। उनके बाद तुम सब मेरे परम देव हो।'॥22॥
'For all the Ikshwaku clan, priest Vasishthaji is the ultimate salvation. After him, all of you are my ultimate deities.'॥ 22॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तपञ्चाश: सर्ग:॥ ५७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×