श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  1.57.19-20 
गुरुपुत्रानहं सर्वान् नमस्कृत्य प्रसादये।
शिरसा प्रणतो याचे ब्राह्मणांस्तपसि स्थितान्॥ १९॥
ते मां भवन्त: सिद्धॺर्थं याजयन्तु समाहिता:।
सशरीरो यथाहं वै देवलोकमवाप्नुयाम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
मैं समस्त गुरुपुत्रों को नमस्कार करके प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप लोग तपस्या में तत्पर ब्राह्मण हैं। मैं आपके चरणों में सिर रखकर प्रार्थना करता हूँ कि आप एकाग्र होकर मेरी मनोकामना पूर्ति के लिए ऐसा यज्ञ करवाएँ, जिससे मैं इसी शरीर से देवलोक जा सकूँ।॥19-20॥
 
‘I want to please all the Guruputras by saluting them. You are Brahmins who are engaged in penance. I place my head at your feet and request you to concentrate and make me perform such a yagya for the fulfillment of my desire, so that I can go to Devlok with this body.॥ 19-20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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