श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  1.57.16-17h 
सोऽभिगम्य महात्मान: सर्वानेव गुरो: सुतान्।
अभिवाद्यानुपूर्वेण ह्रिया किंचिदवाङ्मुख:॥ १६॥
अब्रवीत् स महात्मान: सर्वानेव कृताञ्जलि:।
 
 
अनुवाद
वह उन सब महात्माओं, गुरुपुत्रों के पास गया, उनको एक-एक करके प्रणाम किया, लज्जा से मुख नीचा किया और हाथ जोड़कर उन सब महात्माओं से बोला - ॥16 1/2॥
 
He went to all those great souls, sons of Gurus, bowed to them one by one, lowered his face in shame and with folded hands said to all those great souls - ॥16 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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