श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  1.57.13-14h 
प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन स ययौ दक्षिणां दिशम्॥ १३॥
ततस्तत्कर्मसिद्धॺर्थं पुत्रांस्तस्य गतो नृप:।
 
 
अनुवाद
जब वसिष्ठजी ने उसे शून्य उत्तर दे दिया, तब राजा अपने कार्य की सफलता के लिए दक्षिण दिशा में अपने पुत्रों के पास चले गए ॥13 1/2॥
 
When Vasishtha gave him a blank answer, the king then went to his sons in the south to achieve the success of his task. ॥ 13 1/2 ॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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