श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  1.57.12-13h 
वसिष्ठं स समाहूय कथयामास चिन्तितम्॥ १२॥
अशक्यमिति चाप्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना।
 
 
अनुवाद
तब उन्होंने वशिष्ठजी को बुलाकर अपना विचार बताया। महात्मा वशिष्ठजी ने उनसे कहा कि 'यह असंभव है।'
 
Then he called Vasishtha and told him his idea. Mahatma Vasishtha told him that 'this is impossible'. 12 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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