श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.57.1-2 
तत: संतप्तहृदय: स्मरन्निग्रहमात्मन:।
विनि:श्वस्य विनि:श्वस्य कृतवैरो महात्मना॥ १॥
स दक्षिणां दिशं गत्वा महिष्या सह राघव।
तताप परमं घोरं विश्वामित्रो महातपा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
श्री राम! तत्पश्चात् विश्वामित्र अपनी पराजय का स्मरण करके क्रोधित हो उठे। महात्मा वसिष्ठ से शत्रुता करके महातपस्वी विश्वामित्र अपनी रानी के साथ बार-बार गहरी साँस लेते हुए दक्षिण दिशा में चले गए और वहाँ महान एवं भयंकर तपस्या करने लगे।
 
Shri Ram! Thereafter Vishwamitra became angry remembering his defeat. Having made enmity with Mahatma Vasishtha, the great ascetic Vishwamitra went to the south with his queen taking deep breaths again and again and started performing a great and dreadful penance. 1-2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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