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श्लोक 1.56.4  |
क्व च ते क्षत्रियबलं क्व च ब्रह्मबलं महत्।
पश्य ब्रह्मबलं दिव्यं मम क्षत्रियपांसन॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| 'क्षत्रियकुल कालंक! कहाँ गया तेरा क्षत्रिय बल और कहाँ गया तेरा महान ब्रह्म बल। देख मेरा दिव्य ब्रह्म बल।'॥4॥ |
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| 'Kshatriyakul kaalank! Where is your Kshatriya power and where is your great Brahma power. Look at my divine Brahma power.'॥ 4॥ |
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