श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 56: विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठजी पर नाना प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग,वसिष्ठ द्वारा ब्रह्मदण्ड से ही उनका शमन,विश्वामित्र का ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के लिये तप करने का निश्चय  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.56.4 
क्व च ते क्षत्रियबलं क्व च ब्रह्मबलं महत्।
पश्य ब्रह्मबलं दिव्यं मम क्षत्रियपांसन॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'क्षत्रियकुल कालंक! कहाँ गया तेरा क्षत्रिय बल और कहाँ गया तेरा महान ब्रह्म बल। देख मेरा दिव्य ब्रह्म बल।'॥4॥
 
'Kshatriyakul kaalank! Where is your Kshatriya power and where is your great Brahma power. Look at my divine Brahma power.'॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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