श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 56: विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठजी पर नाना प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग,वसिष्ठ द्वारा ब्रह्मदण्ड से ही उनका शमन,विश्वामित्र का ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के लिये तप करने का निश्चय  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.56.3 
क्षत्रबन्धो स्थितोऽस्म्येष यद् बलं तद् विदर्शय।
नाशयाम्यद्य ते दर्पं शस्त्रस्य तव गाधिज॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'क्षत्रियधाम! मैं खड़ा हूँ। अपनी शक्ति दिखाओ। गाधिपुत्र! आज मैं तुम्हारे अस्त्र-शस्त्र विद्या के गर्व को चूर-चूर कर दूँगा।॥3॥
 
'Kshatriyadham! Here I am standing. Show me whatever strength you have. Son of Gadhi! Today I will crush your pride of knowledge of weapons.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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