श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 53: विश्वामित्र का वसिष्ठ से उनकी कामधेनु को माँगना और उनका देने से अस्वीकार करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.53.13 
शाश्वती शबला मह्यं कीर्तिरात्मवतो यथा।
अस्यां हव्यं च कव्यं च प्राणयात्रा तथैव च॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जैसे ज्ञानी पुरुष का अमर यश उससे कभी अलग नहीं हो सकता, वैसे ही यह शबला गौ, जो सदैव मेरे साथ रहती है, मुझसे कभी अलग नहीं हो सकती। मेरा प्रसाद और मेरा भरण-पोषण इसी पर निर्भर है॥13॥
 
‘Just as the immortal fame of a wise man can never be separated from him, similarly this Shabla cow, who is always with me, can never be separated from me. My offerings and my sustenance depend on it.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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