श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 51: शतानन्द को अहल्या के उद्धार का समाचार बताना,शतानन्द द्वारा श्रीराम का अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजी के पूर्वचरित्र का वर्णन  »  श्लोक 25-28
 
 
श्लोक  1.51.25-28 
तपश्चरणसंसिद्धैरग्निकल्पैर्महात्मभि:॥ २५॥
सततं संकुलं श्रीमद‍्ब्रह्मकल्पैर्महात्मभि:।
अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शीर्णपर्णाशनैस्तथा॥ २६॥
फलमूलाशनैर्दान्तैर्जितदोषैर्जितेन्द्रियै:।
ऋषिभिर्वालखिल्यैश्च जपहोमपरायणै:॥ २७॥
अन्यैर्वैखानसैश्चैव समन्तादुपशोभितम्।
वसिष्ठस्याश्रमपदं ब्रह्मलोकमिवापरम्।
ददर्श जयतां श्रेष्ठो विश्वामित्रो महाबल:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वह आश्रम अग्नि के समान तेजस्वी, तप द्वारा सिद्धि प्राप्त महात्माओं और ब्रह्मा के समान महान् आत्माओं से सदैव भरा रहता था। उनमें से कुछ जल पीकर, तो कुछ वायु पीकर जीवन निर्वाह करते थे। अनेक महात्मा फल-मूल खाकर या सूखे पत्ते चबाकर अपना जीवन निर्वाह करते थे। अनेक ऋषिगण, जिन्होंने आसक्ति आदि विकारों पर विजय प्राप्त करके अपने मन और इंद्रियों को वश में कर लिया था, जप और होम में लगे रहते थे। वाल्खिल्य ऋषि तथा अन्य वैखानस महात्मा उस आश्रम की शोभा चारों ओर से बढ़ा रहे थे। इन सब विशेषताओं के कारण महर्षि वसिष्ठ का वह आश्रम दूसरे ब्रह्मलोक के समान प्रतीत होता था। विजयी वीरों में श्रेष्ठ, पराक्रमी विश्वामित्र वहाँ पधारे।
 
‘That ashram was always filled with great souls, as radiant as fire, who had attained perfection through penance, and great souls as great as Brahma. Some of them lived by drinking water, while others by drinking air. Many of the great souls lived by eating fruits and roots or chewing dry leaves. Many sages, who had control over their mind and senses by conquering vices like attachment, were engaged in chanting and performing homa. Valkhilya sages and other Vaikhanasa great souls enhanced the beauty of that ashram from all sides. Due to all these specialties, that ashram of Maharishi Vasishtha appeared like another Brahmaloka. The mighty Vishwamitra, the best among the victorious heroes, visited it.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकपञ्चाश: सर्ग:॥ ५१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५१॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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