श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 51: शतानन्द को अहल्या के उद्धार का समाचार बताना,शतानन्द द्वारा श्रीराम का अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजी के पूर्वचरित्र का वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.51.14 
अचिन्त्यकर्मा तपसा ब्रह्मर्षिरमितप्रभ:।
विश्वामित्रो महातेजा वेद्‍म्येनं परमां गतिम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
महर्षि विश्वामित्र के कर्म अकल्पनीय हैं। उन्होंने तपस्या द्वारा ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। उनका तेज असीम है और वे अत्यंत तेजस्वी हैं। मैं उन्हें जानता हूँ। वे जगत के परम आश्रय (हितैषी) हैं॥14॥
 
‘The deeds of Maharshi Vishwamitra are inconceivable. He has attained the status of a Brahmarshi through penance. His radiance is limitless and he is extremely radiant. I know him. He is the ultimate refuge (well-wisher) of the world.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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