श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 50: राम आदि का मिथिला-गमन, राजा जनक द्वारा विश्वामित्र का सत्कार तथा उनका श्रीराम और लक्ष्मण के विषय में परिचय पाना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  1.50.14-15h 
अद्य यज्ञफलं प्राप्तं भगवद्दर्शनान्मया।
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगव:॥ १४॥
यज्ञोपसदनं ब्रह्मन् प्राप्तोऽसि मुनिभि: सह।
 
 
अनुवाद
आज आपके पूज्य चरणों के दर्शन से मुझे यज्ञ का फल प्राप्त हुआ है। हे ब्रह्मन्! आप ऋषियों में श्रेष्ठ हैं। आपने अनेक महर्षियों के साथ मेरी यज्ञवेदी में प्रवेश किया, इससे मैं धन्य हूँ। यह आपका मुझ पर महान उपकार है।॥14 1/2॥
 
‘Today, by seeing your revered feet, I have attained the fruit of performing a sacrifice. O Brahman! You are the best among sages. You entered my sacrificial altar along with so many great sages, and I am blessed by this. This is a great favour bestowed upon me by you.॥ 14 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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