श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 49: इन्द्र को भेड़े के अण्डकोष से युक्त करना,भगवान् श्रीराम के द्वारा अहल्या का उद्धार  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.49.3 
अफलोऽस्मि कृतस्तेन क्रोधात् सा च निराकृता।
शापमोक्षेण महता तपोऽस्यापहृतं मया॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'मुनि ने क्रोधित होकर मुझे घोर श्राप दिया, मेरे अंडकोष छीन लिए और अपनी पत्नी का भी त्याग कर दिया। ऐसा करके मैंने उनकी तपस्या का हरण कर लिया है।'
 
‘The sage in anger cursed me severely and deprived me of my testicles and also abandoned his wife. By doing this I have stolen his penance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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