श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 48: मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना  »  श्लोक 29-32
 
 
श्लोक  1.48.29-32 
तथा शप्त्वा च वै शक्रं भार्यामपि च शप्तवान्।
इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि॥ २९॥
वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।
अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि॥ ३०॥
यदा त्वेतद् वनं घोरं रामो दशरथात्मज:।
आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा पूता भविष्यसि॥ ३१॥
तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता।
मत्सकाशं मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिष्यसि॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र को इस प्रकार शाप देने के बाद गौतम ने अपनी पत्नी को भी शाप दिया - 'दुष्ट स्त्री! तू भी हजारों वर्षों तक यहीं भस्म रमाकर केवल वायु पीकर या उपवास करके कष्ट भोगेगी। तू समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर इसी आश्रम में निवास करेगी। जब दशरथ के उग्र पुत्र राम इस सघन वन में प्रवेश करेंगे, तब तू पवित्र हो जाएगी। उनका आतिथ्य करने से तेरा लोभ, मोह आदि दूर हो जाएगा और तू सुखपूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण करेगी।'
 
After cursing Indra in this manner, Gautama also cursed his wife - 'Wicked woman! You will also lie here in ashes for thousands of years, suffering by drinking only air or fasting. You will remain invisible to all beings and reside in this ashram. When the fierce son of Dasharath, Ram, will enter this dense forest, then you will become pure. By hosting him, your greed, attachment, etc. will be removed and you will reach me happily and take your previous body.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)