श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 48: मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना  »  श्लोक 23-25h
 
 
श्लोक  1.48.23-25h 
गौतमं स ददर्शाथ प्रविशन्तं महामुनिम्॥ २३॥
देवदानवदुर्धर्षं तपोबलसमन्वितम्।
तीर्थोदकपरिक्लिन्नं दीप्यमानमिवानलम्॥ २४॥
गृहीतसमिधं तत्र सकुशं मुनिपुंगवम्।
 
 
अनुवाद
तभी उसने देखा कि देवताओं और दानवों को भी भयंकर लगने वाले तथा तपशक्ति से संपन्न महामुनि गौतम हाथ में लकड़ी लिए आश्रम में प्रवेश कर रहे हैं। उनका शरीर तीर्थ के जल में भीगा हुआ था और वे प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहे थे॥ 23-24 1/2॥
 
‘Just then he saw that the great sage Gautama, who was fierce even for the gods and demons and who was endowed with the power of penance, was entering the hermitage carrying firewood in his hand. His body was soaked in the water of the holy place and he was glowing like a blazing fire.॥ 23-24 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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