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ramayan 1.48.20-21h: 'रात्रि के पश्चात् वे संतुष्ट होकर देवराज इन्द्र से बोले - 'सुरश्रेष्ठ! आपके मिलन से मैं कृतार्थ हुआ। प्रभु! अब आप शीघ्र ही यहाँ से चले जाइए। देवेश्वर! महर्षि गौतम के कोप से आप अपनी और मेरी सब प्रकार से रक्षा कीजिए।' 20 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.48: मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 48: मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  1.48.20-21h 
अथाब्रवीत् सुरश्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना।
कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमित: प्रभो॥ २०॥
आत्मानं मां च देवेश सर्वथा रक्ष गौतमात्।
 
 
अनुवाद
'रात्रि के पश्चात् वे संतुष्ट होकर देवराज इन्द्र से बोले - 'सुरश्रेष्ठ! आपके मिलन से मैं कृतार्थ हुआ। प्रभु! अब आप शीघ्र ही यहाँ से चले जाइए। देवेश्वर! महर्षि गौतम के कोप से आप अपनी और मेरी सब प्रकार से रक्षा कीजिए।' 20 1/2॥
 
'After the night, he was satisfied and said to Devraj Indra - 'Surashrestha! I was gratified by your meeting. Lord! Now you leave from here quickly. Deveshwar! Please protect yourself and me in every way from the wrath of Maharishi Gautam. 20 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)