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श्लोक 1.48.19  |
मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।
मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| 'रघुनंदन! महर्षि गौतम के वेश में आये हुए इन्द्र को पहचानकर भी उस मूर्खा स्त्री ने कहा 'अरे! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं, यह जिज्ञासावश मैंने उनसे मिलने का निश्चय किया और प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।' |
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| 'Ragunandan! Even after recognizing Indra who had come in the guise of Maharishi Gautam, that foolish woman said 'Oh! Due to curiosity, Devraj Indra wants me and decided to meet him and accepted the proposal. |
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