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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 48: मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.48.17 
तस्यान्तरं विदित्वा च सहस्राक्ष: शचीपति:।
मुनिवेषधरो भूत्वा अहल्यामिदमब्रवीत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
एक दिन जब महर्षि गौतम आश्रम पर नहीं थे, तब शचीपति इन्द्र ने उपयुक्त अवसर समझकर ऋषि का वेश धारण करके वहाँ आकर अहिल्या से इस प्रकार कहा -॥17॥
 
‘One day, when Maharishi Gautam was not at the hermitage, Sachipati Indra considered it a suitable opportunity and came there disguised as a sage and spoke to Ahalya as follows -॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)