श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 48: मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.48.10 
तां दृष्ट्वा मुनय: सर्वे जनकस्य पुरीं शुभाम्।
साधु साध्विति शंसन्तो मिथिलां समपूजयन्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मिथिला पहुँचकर जनकपुरी की सुन्दर शोभा देखकर सभी ऋषिगण 'साधु-साधु' कहकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
 
On reaching Mithila and seeing the beautiful splendor of Janakpuri all the sages began to praise it profusely, calling it 'Sadhu-Sadhu'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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