श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 47: दिति का अपने पुत्रों को मरुद्गण बनाकर देवलोक में रखने के लिये इन्द्र से अनुरोध, इक्ष्वाकु-पुत्र विशाल द्वारा विशाला नगरी का निर्माण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.47.4 
वातस्कन्धा इमे सप्त चरन्तु दिवि पुत्रक।
मारुता इति विख्याता दिव्यरूपा ममात्मजा:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'पुत्र! मेरा यह दिव्य रूप वाला पुत्र 'मरुत' नाम से विख्यात हो और आकाश में प्रसिद्ध सात वात्स्कन्धों में विचरण करे॥4॥
 
'Son! May this son of mine in divine form become famous by the name 'Marut' and roam among the famous seven Vaatskandhas* in the sky. 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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