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श्लोक 1.47.4  |
वातस्कन्धा इमे सप्त चरन्तु दिवि पुत्रक।
मारुता इति विख्याता दिव्यरूपा ममात्मजा:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| 'पुत्र! मेरा यह दिव्य रूप वाला पुत्र 'मरुत' नाम से विख्यात हो और आकाश में प्रसिद्ध सात वात्स्कन्धों में विचरण करे॥4॥ |
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| 'Son! May this son of mine in divine form become famous by the name 'Marut' and roam among the famous seven Vaatskandhas* in the sky. 4॥ |
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