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ramayan 1.45.3: हे काम, क्रोध आदि शत्रुओं को पीड़ा देने वाले महर्षि! आपके द्वारा कही गई सम्पूर्ण कथा का गहन चिंतन करते हुए यह रात्रि हम दोनों भाइयों के लिए क्षणमात्र के समान व्यतीत हो गई है॥3॥   |   ramayan सर्ग 1.45: देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 45: देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.45.3 
क्षणभूतेव नौ रात्रि: संवृत्तेयं परंतप।
इमां चिन्तयतो: सर्वां निखिलेन कथां तव॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे काम, क्रोध आदि शत्रुओं को पीड़ा देने वाले महर्षि! आपके द्वारा कही गई सम्पूर्ण कथा का गहन चिंतन करते हुए यह रात्रि हम दोनों भाइयों के लिए क्षणमात्र के समान व्यतीत हो गई है॥3॥
 
'O Maharishi, who torments the enemies of lust, anger, etc.! This night has passed like a moment for both of us brothers while we have been thinking thoroughly over the entire story told by you.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)