श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 40: सगर के पुत्रों का पृथ्वी को खोदते हुए कपिलजी के पास पहुँचना और उनके रोष से जलकर भस्म होना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.40.4 
पृथिव्याश्चापि निर्भेदो दृष्ट एव सनातन:।
सगरस्य च पुत्राणां विनाशो दीर्घदर्शिनाम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'यह पृथ्वी का छेदन नित्य है - प्रत्येक कल्प में अवश्यम्भावी है। (यह श्रुति और स्मृतियों में प्रयुक्त सगर आदि शब्दों से स्पष्ट है।) इसी प्रकार दूरदर्शी पुरुषों ने सगर के पुत्रों का भावी विनाश भी देख लिया है; अतः इस विषय में शोक करना अनुचित है।'
 
‘This piercing of the earth is eternal – it is inevitable in every Kalpa. (This is clearly evident from the words like Sagar etc. used in Shrutis and Smritis.) Similarly, far-sighted men have also seen the future destruction of Sagar's sons; hence it is inappropriate to grieve on this matter.'
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd