श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 39: इन्द्र के द्वारा राजा सगर के यज्ञ सम्बन्धी अश्व का अपहरण, सगरपुत्रों द्वारा सारी पृथ्वी का भेदन  »  श्लोक 8-11h
 
 
श्लोक  1.39.8-11h 
ह्रियमाणे तु काकुत्स्थ तस्मिन्नश्वे महात्मन:॥ ८॥
उपाध्यायगणा: सर्वे यजमानमथाब्रुवन्।
अयं पर्वणि वेगेन यज्ञियाश्वोऽपनीयते॥ ९॥
हर्तारं जहि काकुत्स्थ हयश्चैवोपनीयताम्।
यज्ञच्छिद्रं भवत्येतत् सर्वेषामशिवाय न:॥ १०॥
तत् तथा क्रियतां राजन् यज्ञोऽच्छिद्र: कृतो भवेत् ।
 
 
अनुवाद
'ककुत्स्थ! जब महामना सागर का घोड़ा अपहरण किया जा रहा था, तब समस्त पुरोहितों ने यजमान सागर से कहा—'ककुत्स्थानन्दन! आज पर्व के दिन कोई व्यक्ति इस यज्ञ-सम्बन्धी घोड़े को चुराकर बड़ी तेजी से ले जा रहा है। आप चोर को मारकर घोड़ा वापस ले आएँ, अन्यथा यज्ञ में विघ्न पड़ेगा और यह हम सबके लिए दुर्भाग्य का कारण बनेगा। राजन! आप ऐसा प्रयत्न करें, जिससे यह यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो।'
 
‘Kakutstha! When the horse of Mahamana Sagar was being kidnapped, all the priests said to the host Sagar—‘Kakutsthanandan! Today on the day of the festival, someone has stolen this horse related to the yagya and is taking it away at a great speed. You kill the thief and bring back the horse, otherwise the yagya will be interrupted and it will be the cause of misfortune for all of us. King! You make such efforts, so that this yagya is completed without any obstruction.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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