श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 39: इन्द्र के द्वारा राजा सगर के यज्ञ सम्बन्धी अश्व का अपहरण, सगरपुत्रों द्वारा सारी पृथ्वी का भेदन  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  1.39.4-5 
श्रूयतां विस्तरो राम सगरस्य महात्मन:।
शंकरश्वशुरो नाम्ना हिमवानिति विश्रुत:॥ ४॥
विन्ध्यपर्वतमासाद्य निरीक्षेते परस्परम्।
तयोर्मध्ये समभवद् यज्ञ: स पुरुषोत्तम॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'राम! आप महात्मा सगर के यज्ञ का विस्तृत वर्णन सुनिए। पुरुषोत्तम! शंकरजी के पिता हिमवान नामक प्रसिद्ध पर्वत विन्ध्याचल पहुँचकर और विन्ध्य पर्वत पर पहुँचकर हिमवान दोनों एक-दूसरे को देखते हैं (इन दोनों के बीच में कोई दूसरा ऊँचा पर्वत नहीं है, जो उनके परस्पर दर्शन में बाधा उत्पन्न कर सके)। इन्हीं दोनों पर्वतों के बीच आर्यावर्त की पवित्र भूमि में उस यज्ञ का अनुष्ठान हुआ। 4-5॥
 
'Ram! You listen to the detailed description of Mahatma Sagar's yagya. Purushottam! After reaching Vindhyachal, the famous mountain named Himavan, the father of Shankarji, and after reaching Vindhya mountain Himavan, both of them see each other (there is no other high mountain between these two, which can create a hindrance in their mutual darshan). The ritual of that Yagya was performed in the holy land of Aryavarta between these two mountains. 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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