श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 35: विश्वामित्र आदि का गंगाजी के तट पर रात्रिवास करना, गंगाजी की उत्पत्ति की कथा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.35.4 
अयं शोण: शुभजलोऽगाध: पुलिनमण्डित:।
कतरेण पथा ब्रह्मन् संतरिष्यामहे वयम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'ब्रह्मन्! शुभ जल से परिपूर्ण और तटों से सुशोभित यह शोणभद्र नदी अथाह प्रतीत होती है। हम इसे किस मार्ग से पार करें?'॥4॥
 
'Brahman! This Shonabhadra river, full of auspicious water and adorned with its banks, seems to be unfathomable. By which route shall we cross it?'॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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