श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 35: विश्वामित्र आदि का गंगाजी के तट पर रात्रिवास करना, गंगाजी की उत्पत्ति की कथा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.35.2 
सुप्रभाता निशा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते गमनायाभिरोचय॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘श्री राम! रात्रि बीत गई है। प्रातः हो गई है। आपका कल्याण हो, उठिए, उठिए और प्रस्थान के लिए तैयार हो जाइए।’॥2॥
 
‘Shri Ram! The night has passed. It is morning. May you be blessed, get up, get up and get ready to leave.’॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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