श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 35: विश्वामित्र आदि का गंगाजी के तट पर रात्रिवास करना, गंगाजी की उत्पत्ति की कथा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.35.12 
भगवन् श्रोतुमिच्छामि गंगां त्रिपथगां नदीम्।
त्रैलोक्यं कथमाक्रम्य गता नदनदीपतिम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि यह गंगा नदी तीनों दिशाओं में बहती हुई, तीनों लोकों में भ्रमण करती हुई, समस्त नदियों के स्वामी समुद्र में किस प्रकार मिल गई?॥12॥
 
'O Lord! I wish to hear how this river Ganga, flowing through three directions, after roaming in the three worlds, has merged into the ocean, the lord of all rivers?'॥ 12॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas