श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 32: ब्रह्मपुत्र कुश पुत्रों का वर्णन, कुशनाभ की सौ कन्याओं का वायु के कोप से ‘कुब्जा’ होना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.32.21 
मा भूत् स कालो दुर्मेध: पितरं सत्यवादिनम्।
अवमन्य स्वधर्मेण स्वयंवरमुपास्महे॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'यह पाप है! ऐसा समय कभी न आए कि हम अपने सत्यनिष्ठ पिता की उपेक्षा करके कामवश अथवा अत्यन्त अधर्मपूर्वक स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें॥ 21॥
 
'It is a sin! May that time never come when we ignore our truthful father and start looking for a groom ourselves due to lust or in a very unrighteous manner.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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