श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 32: ब्रह्मपुत्र कुश पुत्रों का वर्णन, कुशनाभ की सौ कन्याओं का वायु के कोप से ‘कुब्जा’ होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.32.18 
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वायोरक्लिष्टकर्मण:।
अपहास्य ततो वाक्यं कन्याशतमथाब्रवीत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
बिना किसी प्रयास के ही महान् कर्म करने वाले वायुदेव के ये वचन सुनकर सौ कन्याएँ ठठाकर हँसने लगीं और बोलीं-॥18॥
 
Hearing these words of Vāyudev, who without any effort performs great deeds, the hundred girls laughed sardonically and said -॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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