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श्लोक 1.31.4  |
इमौ स्म मुनिशार्दूल किंकरौ समुपागतौ।
आज्ञापय मुनिश्रेष्ठ शासनं करवाव किम्॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मुनिप्रवर! हम दोनों सेवक आपकी सेवा में उपस्थित हैं। महामुनि! कृपया आज्ञा करें, हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं?’॥4॥ |
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| ‘Munipravar! We both servants are present in your service. Great sage! Please order, what service can we offer you?’॥ 4॥ |
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