श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 3: वाल्मीकि मुनि द्वारा रामायण काव्य में निबद्ध विषयों का संक्षेप से उल्लेख  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  1.3.8-9 
कामार्थगुणसंयुक्तं धर्मार्थगुणविस्तरम्।
समुद्रमिव रत्नाढॺं सर्वश्रुतिमनोहरम्॥ ८॥
स यथा कथितं पूर्वं नारदेन महात्मना।
रघुवंशस्य चरितं चकार भगवान् मुनि:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
भगवान वाल्मीकि मुनि ने महात्मा नारदजी द्वारा पूर्व में वर्णित रघुवंशविभूषण श्री राम के चरित्र पर रामायण काव्य की रचना की। जिस प्रकार समुद्र समस्त रत्नों का भण्डार है, उसी प्रकार यह महाकाव्य गुण, अलंकार और शब्द आदि रत्नों का भण्डार है। इतना ही नहीं, समस्त श्रुतियों के सारभूत अर्थ का प्रतिपादन करने के कारण यह सबके कानों को प्रिय और सबके मन को आकर्षित करने वाला है। यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी गुणों (फलों) से परिपूर्ण है तथा इनका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन और दान करता है।
 
Lord Valmiki Muni composed the Ramayana poem on the character of Raghuvanshvibhushan Shri Ram as described earlier by Mahatma Naradji. Just as the ocean is the storehouse of all the gems, similarly this epic is the storehouse of gems like quality, ornamentation and sound etc. Not only this, because it expounds the essential meaning of all the Shrutis, it is endearing to everyone's ears and attracts everyone's mind. It is full of the qualities (fruits) of religion, wealth, lust and salvation and it propounds and donates them in detail. 8-9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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