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सर्वं मे शंस भगवन् कस्याश्रमपदं त्विदम्।
सम्प्राप्ता यत्र ते पापा ब्रह्मघ्ना दुष्टचारिण:॥ २०॥
तव यज्ञस्य विघ्नाय दुरात्मानो महामुने।
भगवंस्तस्य को देश: सा यत्र तव याज्ञिकी॥ २१॥
रक्षितव्या क्रिया ब्रह्मन् मया वध्याश्च राक्षसा:।
एतत् सर्वं मुनिश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो॥ २२॥
अनुवाद
'भगवन्! मुझे सब कुछ बताइए। यह आश्रम किसका है? हे प्रभु! हे महामुनि! जहाँ आपका यज्ञ हो रहा है, जहाँ वे पापी, दुराचारी, ब्रह्महत्यारे, दुष्टचित्त राक्षस आपके यज्ञ में विघ्न डालने आते हैं और जहाँ मुझे यज्ञ की रक्षा और राक्षसों का संहार करना है, वह आश्रम का कौन-सा भाग है? ब्रह्मन्! महामुनि, प्रभु! मैं यह सब सुनना चाहता हूँ।
‘Lord! Tell me everything. Whose ashram is this? Lord! O great sage! Where your yajna is being performed, where those sinners, evil-doers, brahmin-killers, evil-minded demons come to create disturbance in your yajna and where I have to protect the yajna and kill the demons, which part of that ashram is that? Brahman! Great sage, Lord! I want to hear all this.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टाविंश: सर्ग:॥ २८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥