स च तान् राघवो ज्ञात्वा विश्वामित्रं महामुनिम्।
गच्छन्नेवाथ मधुरं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥ १६॥
किमेतन्मेघसंकाशं पर्वतस्याविदूरत:।
वृक्षखण्डमितो भाति परं कौतूहलं हि मे॥ १७॥
अनुवाद
इस प्रकार इन अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके श्री रघुनाथजी ने मार्ग में चलते हुए महर्षि विश्वामित्र से मधुर वाणी में पूछा - 'प्रभो! सामने पर्वत के पास घने वृक्षों से युक्त यह मेघों के समान दिखने वाला स्थान क्या है? मैं इसे जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ।॥ 16-17॥
Having thus acquired the knowledge of these weapons, Shri Raghunath, while on his way, asked the great sage Viswamitra in a sweet voice, 'Lord! What is this place filled with dense trees that looks like a cloud of clouds near the mountain in front? I am very eager to know about it.॥ 16-17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥