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श्लोक 1.25.5  |
पूर्वमासीन्महायक्ष: सुकेतुर्नाम वीर्यवान्।
अनपत्य: शुभाचार: स च तेपे महत्तप:॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| प्राचीन काल की कथा है, सुकेतु नाम का एक महान यक्ष था। वह बहुत शक्तिशाली और गुणी था; किन्तु उसकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उसने घोर तपस्या की। |
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| ‘It is a story of ancient times, there was a great Yaksha named Suketu. He was very powerful and virtuous; but he had no children; therefore he performed great penance. |
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