श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 25: श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का ताटका की उत्पत्ति, विवाह एवं शाप आदि का प्रसंग सुना ताटका-वध के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  1.25.12-13 
अगस्त्य: परमामर्षस्ताटकामपि शप्तवान्॥ १२॥
पुरुषादी महायक्षी विकृता विकृतानना।
इदं रूपं विहायाशु दारुणं रूपमस्तु ते॥ १३॥
 
 
अनुवाद
तब ऋषि ने अत्यन्त क्रोध में भरकर ताड़का को भी शाप दे दिया - 'तू भयंकर मुख वाला नरभक्षी राक्षस हो जा। तू महायोद्धा है; किन्तु अब शीघ्र ही तू यह रूप त्यागकर भयंकर रूप वाला हो जाएगा।' 12-13॥
 
Then the sage, filled with great anger, cursed Tataka also - 'You become a cannibalistic demon with a hideous face. You are a great warrior; But now soon you will leave this form and become a fearsome form. 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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