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श्लोक 1.24.13-14  |
अहो वनमिदं दुर्गं झिल्लिकागणसंयुतम्॥ १३॥
भैरवै: श्वापदै: कीर्णं शकुन्तैर्दारुणारवै:।
नानाप्रकारै: शकुनैर्वाश्यद्भिर्भैरवस्वनै:॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| गुरुदेव! यह वन अत्यंत विचित्र एवं दुर्गम है। सर्वत्र झिल्लियों की ध्वनि सुनाई देती है। यह भयंकर हिंसक पशुओं से भरा हुआ है। भयंकर भाषा बोलने वाले पक्षी सर्वत्र फैले हुए हैं। नाना प्रकार के पक्षी भयंकर स्वर में चहचहा रहे हैं।॥13-14॥ |
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| ‘Gurudev! This forest is very strange and inaccessible. The sound of membranes can be heard everywhere. It is full of terrible ferocious animals. Birds speaking terrifying language are spread everywhere. Various types of birds are chirping in terrifying voices.॥ 13-14॥ |
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