श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म, संस्कार, शीलस्वभाव एवं सद्गुण, राजा के दरबार में विश्वामित्र का आगमन और उनका सत्कार  »  श्लोक 50-52
 
 
श्लोक  1.18.50-52 
यथामृतस्य सम्प्राप्तिर्यथा वर्षमनूदके॥ ५०॥
यथा सदृशदारेषु पुत्रजन्माप्रजस्य वै।
प्रणष्टस्य यथा लाभो यथा हर्षो महोदय:॥ ५१॥
तथैवागमनं मन्ये स्वागतं ते महामुने।
कं च ते परमं कामं करोमि किमु हर्षित:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
महामुनि! जैसे मरणधर्मा मनुष्य को अमृत मिल जाता है, निर्जल स्थान में जल बरसता है, निःसन्तान को योग्य पत्नी से पुत्र प्राप्त होता है, खोया हुआ धन मिल जाता है और बड़े उत्सव से सुख की प्राप्ति होती है, वैसे ही आपका यहाँ आगमन शुभ हुआ है। ऐसा मेरा विश्वास है। आपका स्वागत है। आपके मन में कौन-सी उत्तम इच्छा है, जिसे मैं प्रसन्नतापूर्वक पूर्ण करूँ?॥ 50-52॥
 
‘Mahamuni! Just as a mortal man may get nectar, water may rain in a waterless place, a childless person may get a son from a suitable wife, a lost treasure may be found and happiness may arise from a great celebration, similarly, your arrival here has been auspicious. I believe so. You are welcome. Which is the best wish in your mind, which I may fulfill with joy?॥ 50-52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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