श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 15: ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.15.9 
ऋषीन् यक्षान् सगन्धर्वान् ब्राह्मणानसुरांस्तदा।
अतिक्रामति दुर्धर्षो वरदानेन मोहित:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
'आपके वरदान से मोहित होकर वह इतना अभिमानी हो गया है कि ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, राक्षसों और ब्राह्मणों को कष्ट और अपमान देता फिरता है।॥9॥
 
'Being enticed by your boon, he has become so arrogant that he goes about tormenting and insulting sages, Yakshas, ​​Gandharvas, demons and Brahmins.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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