श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 15: ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.15.7 
त्वया तस्मै वरो दत्त: प्रीतेन भगवंस्तदा।
मानयन्तश्च तं नित्यं सर्वं तस्य क्षमामहे॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'प्रभु! आपने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया था। तब से हम सदैव उस वरदान का आदर करते आए हैं और उसके समस्त अपराधों को सहन करते आए हैं। ॥7॥
 
‘Prabhu! You were pleased and granted him a boon. Since then we have always respected that boon and have tolerated all his crimes. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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