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श्लोक 1.15.34  |
तमेव हत्वा सबलं सबान्धवं
विरावणं रावणमुग्रपौरुषम्।
स्वर्लोकमागच्छ गतज्वरश्चिरं
सुरेन्द्रगुप्तं गतदोषकल्मषम्॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| उपेन्द्र! सम्पूर्ण जगत को रुलाने वाले उस भयंकर एवं बलवान रावण का उसकी सेना और मित्रों सहित नाश करके, अपने स्वाभाविक मन की शांति के साथ, अपने द्वारा रक्षित उस सनातन वैकुण्ठ धाम को वापस जाओ; जो राग-द्वेष आदि विकारों के मल से कभी स्पर्श नहीं होता॥ 34॥ |
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| 'Upendra! After destroying that fierce and powerful Ravana, who makes the entire world cry, along with his army and friends, go back to that eternal Vaikuntha Dham, which is protected by you, with your natural peace of mind; which is never touched by the impurities of vices like love-hatred etc.'॥ 34॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चदश: सर्ग:॥ १५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५॥ |
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